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Tuesday, April 5, 2011

मुझे घर याद करता है।

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वही आंगन, वही खिड़की, वही दर याद आता है,
मैं जब भी तन्हां होता हूं, मुझे घर याद करता है।
मेरे सीने की हिचकी भी, मुझे खुलकर बताती है,
तेरे अपनों को गांव में, तू अक्सर याद आता है।
जो अपने पास हो उसकी कोई कीमत नहीं होती,
हमारे भाई को ही लो, बिछड़कर याद आता है।
सफलता के सफर में तो कहां फुर्सत के, कुछ सोचें,
मगर जब चोट लगती है, मुकद्दर याद आता है।
मई और जून की गर्मी, बदन से जब टपकती है,
नवंबर याद आता है, दिसंबर याद आता है।
SURENDRA THAKUR (A-Gyaniji)