| असर बुजुर्गों की नेमतों का, हमारे अंदर से झांकता है, | |
| पुरानी नदियों का मीठा पानी, नए समंदर से झांकता है। | |
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| न जिस्म कोई, न दिल न आंखें, मगर ये जादूगरी तो देखो, |
| हर एक शै में धड़क रहा है, हर एक मंजर से झांकता है। | |
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| लबों पे खामोशियों का पहरा, नजर परेशां उदास चेहरा, | |
| तुम्हारे दिल का हर एक जज्बा, तुम्हारे तेवर से झांकता है। |
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| चहक रहे हैं चमन में पंछी, दरख्त अंगड़ाई ले रहे हैं, | |
| बदल रहा है दुखों का मौसम, बसंत पतझर से झांकता है। | |
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| गले में मां ने पहन रखे हैं, महीन धागे में चंद मोती, | |
| हमारी गर्दिश का हर सितारा, उस एक जेवर से झांकता है। |
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| थके पिता का उदास चेहरा, उभर रहा है यूं मेरे दिल में, | |
| कि प्यासे बादल का अक्स जैसे किसी सरोवर से झांकता है। |
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| | SURENDRA THAKUR (A-Gyaniji) |
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