| असर बुजुर्गों की नेमतों का, हमारे अंदर से झांकता है, | ||||||
| पुरानी नदियों का मीठा पानी, नए समंदर से झांकता है। | ||||||
| न जिस्म कोई, न दिल न आंखें, मगर ये जादूगरी तो देखो, | ||||||
| हर एक शै में धड़क रहा है, हर एक मंजर से झांकता है। | ||||||
| लबों पे खामोशियों का पहरा, नजर परेशां उदास चेहरा, | ||||||
| तुम्हारे दिल का हर एक जज्बा, तुम्हारे तेवर से झांकता है। | ||||||
| चहक रहे हैं चमन में पंछी, दरख्त अंगड़ाई ले रहे हैं, | ||||||
| बदल रहा है दुखों का मौसम, बसंत पतझर से झांकता है। | ||||||
| गले में मां ने पहन रखे हैं, महीन धागे में चंद मोती, | ||||||
| हमारी गर्दिश का हर सितारा, उस एक जेवर से झांकता है। | ||||||
| थके पिता का उदास चेहरा, उभर रहा है यूं मेरे दिल में, | ||||||
| कि प्यासे बादल का अक्स जैसे किसी सरोवर से झांकता है। | ||||||
| SURENDRA THAKUR (A-Gyaniji) | ||||||
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Tuesday, April 5, 2011
असर बुजुर्गों की नेमतों का, हमारे अंदर से झांकता है,
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