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Tuesday, April 5, 2011

असर बुजुर्गों की नेमतों का, हमारे अंदर से झांकता है,

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असर बुजुर्गों की नेमतों का, हमारे अंदर से झांकता है,
पुरानी नदियों का मीठा पानी, नए समंदर से झांकता है।
न जिस्म कोई, न दिल न आंखें, मगर ये जादूगरी तो देखो,
हर एक शै में धड़क रहा है, हर एक मंजर से झांकता है।
लबों पे खामोशियों का पहरा, नजर परेशां उदास चेहरा,
तुम्हारे दिल का हर एक जज्बा, तुम्हारे तेवर से झांकता है।
चहक रहे हैं चमन में पंछी, दरख्त अंगड़ाई ले रहे हैं,
बदल रहा है दुखों का मौसम, बसंत पतझर से झांकता है।
गले में मां ने पहन रखे हैं, महीन धागे में चंद मोती,
हमारी गर्दिश का हर सितारा, उस एक जेवर से झांकता है।
थके पिता का उदास चेहरा, उभर रहा है यूं मेरे दिल में,
कि प्यासे बादल का अक्स जैसे किसी सरोवर से झांकता है।
SURENDRA THAKUR (A-Gyaniji)